एक बूँद वफ़ा

एक बूँद वफ़ा

तरसती रही ताउम्र मगर,
एक बूँद भी ना मुझे वफ़ा मिली !!

नामुमकिन था जिसके बिना सांस भी लेना ,
उसी से दूर रहने की सज़ा मिली !!

तन्हाई ने अपनी आगोश में समेट लिया मुझे कुछ इस कदर ,
कि अँधेरे में देखा खुद को तो मेरी परछाई भी मुझसे जुदा मिली !!

मैं भागती रही उसकी यादों से पीछा छुड़ाने के लिए,
मगर हर शहर हर गली मुझे उसकी शदा मिली !!

मैं भटकती रही दर बदर अनजान मुशाफिर की तरह,
मुझे ख्वाहिश थी खूबसूरत सुबह की मगर शाम की खिजा मिली !!

जिसकी दहलीज़ पर खड़े होकर इबादत करती रही सुबह शाम,
उसने भी रहम ना किया वो पत्थर की मूरत भी मुझसे खफा मिली !!
इसे किश्मत की बेवफाई कहु या मेरी बदनसीबी,
ना ज़िन्दगी ने अपनी कैद से आजाद किया ना जीने की वजह मिली !!

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