खुद को खोते देखा है

खुद को खोते देखा है

किसी को पाने की चाहत में खुद को खोते देखा है,
मुस्कराने की ख्वाहिश में आँखों को रोते देखा है !!

नाकाम हो गईं कोशिशें इबादतें बेअसर रहीं,
किसी और के हक़ को किसी और का होते देखा है !!

कम नहीं होता वो दर्द जो मोहब्बत देती है,
जागते रहते हैं ख्वाब रात भर बिस्तर पर तन्हाई को सोते देखा है !!

कभी लहरें उठकर गिरा करतीं थीं जिसके क़दमों में,
उसे दरिया के किनारे बैठकर एक बूँद के लिए तरसते देखा है !!

बयां भी न कर सके कभी दिल की कसमकस को,
शिकायत में मजबूर होठों को लरजते देखा है !!

उम्मीद करती रही बंजर जमीं आशमां से मगर,
बादलों को अक्सर हरियाली में बरसते देखा है !!

जो कभी मुकम्मल नहीं हो सकता उसका ऐतबार क्यो है,
सपनों की राख में उम्मीद की आखिरी चिंगारी को जलते देखा !!

हर किसी को मंजिल नहीं मिलती राह-ऐ-ज़िन्दगी में,
भटके हुए मुसाफिर को सिर्फ रास्तों पर चलते देखा है !!

न आई कभी बहार वो सींचता रहा बगवां को मगर,
कमल को सिर्फ कीचड़ में ही खिलते देखा है !!

कैसे यकीन करें इन फरेबी चेहरों पर कोई,
जिसका ऐतबार सबसे जादा था उसे ही मुकरते देखा है !!

मिटते नहीं हैं बजूद से कुछ नाम-ओ-निशां कभी,
सब खत्म होने के बाद भी उसे सांसो में गुजरते देखा है!!

कभी उसका नाम सुनकर लव मुस्कराया करते थे,
आज उसे रूह में जहर की तरह उतरते देखा है !!

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