तूफ़ान

तूफ़ान

तबाह कर ही देता तूफान पर किसी का जोर नहीं चलता,
कितनी भी दुआ पडलो अपने हक में मगर दुआओं से मुकद्दर नही बदलता।

वो तरसता रहा अपने मेहबूब से एक मुलाकात के लिए,
अक्सर डूब ही जाती है दरिया में इश्क़ की कश्ती को किनारा नही मिलता।।

कभी सुनाई नही दी उसे मेरी बेजुबान सदायें,
कैसे बयाँ करूँ उस दर्द के आलम को जब रोने पर आँखों से आंशू नही निकलता।।

तन्हा नहीं छोड़ती तन्हाइयां खामोशियों का शोर सोने नही देता,

वो तरसता रहा रोशनी के लिए न जाने क्यों उसके आंगन में सूरज नही निकलता।।

वो रोता रहा अक्सर उसकी दहलीज पर खड़े होकर मगर,
मासूम था वो नहीं जानता कि रोने से कभी पत्थर नहीं पिघलता ।।

चले जाते हैं लोग जिंदगी से अक्सर तन्हा छोड़कर,
सब खत्म होने के बाद भी बजूद से उनका अक्स नहीं निकलता

छुपाकर अंशुओं का शैलाब पलकों तले मुस्कराते तो हैं,
मगर झूठी मुस्कराहट से कभी रूह को सुकून नहीं मिलता।।

कितना बेबस कर देती हैं कभी कभी उम्मीदें,
वो सींचता रहा ये जानते हुए भी कि सूखे पौधे पर फूल नही खिलता।।

क्यों हम उसको जिंदगी का हमसफर बना लेते हैं,
जो ठीक से दो कदम भी हमारे साथ नहीं चलता ।।

जलाकर ख्वाब अपने तमाम घरों को रौशन कर दिया उसने,
जिसके अंधेरे घर में एक दिया तक नहीं जलता।।

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