मासूम चेहरा निगाहें फरेबी लबों पे हसी और दिल में देगा है,
मिला हो जिसे दोस्त ऐसा उसे दुश्मनों की कमी क्या है।
जब भी जी चाहे नहीं दुनियाँ बसा लेते हैं लोग,
एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग।

इंसान कितना फरेबी कितना स्वार्थी होता जा रहा है उसे फर्क नहीं पड़ता कि कौन जी रहा है कौन मर रहा है उसे तो सिर्फ खुद से मतलब है अपनी जरूरतें पूरा होने से मतलब है।

कोई नहीं सोचता कि हमने जिसके साथ धोखा किया है उसे कितनी तकलीफ हुई होगी, हमने अपने फायदे के लिए जिसे इस्तेमाल किया है जब उसे सच पता चलेगा तो कितना दर्द होगा।

ये सब तो हम कभी सोचते ही नहीं हैं क्यों कि ये सारी बातें तो सिर्फ एक इंसान सोचता है और हमने तो वो सब ख़त्म कर दिया है जिससे हम इंसान बनते हैं हम इंसान ही नहीं रहे हम एक मशीन बन चुके हैं जिसके अंदर न भावनाएं हैं और नहीं एहसास।

सिर्फ अपने फायदे के लिए न जाने कितने लोगों के भरोसे का क़त्ल करते हैं न जाने कितने बेगुनाहों की उम्मीदों को तोड़ते हैं जो दिन रात मेहनत करके ईमानदारी से अपने सपनों को साकार करना चाहता है हम अपने थोड़े से फायदे के लिए उसके सपनों को तोड़ देते हैं क्यों कि हमारी नज़र में किसी के सपनो, भावनाओ और जज्बातों की कोई कीमत नहीं है।

ये इतना बड़ा गुनाह करके कुछ हांसिल कर भी लेते हैं तो वो किस काम का साहब क्यों की लोगों की बद्दुआएं कभी बेकार नहीं जाती एक न एक दिन अपना असर जरूर दिखती हैं जो ख़ुशी और हम ढूंढ रहे हैं वो ऐसे हांसिल नहीं होता

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