सात फेरे

सात फेरे

सात फेरे लिए थे तुम्हारे आँचल से बंध कभी
आज उसी अग्नि पे तुमको लिटाकर फेरे ले आया हूँ
जिस कंधे को खुद का तकिया बताती थी तुम
उन्हीं कांधों पे तुमको बहुत दूर छोड़ आया हूँ
बेजान जिस्म सा देर तक अब मैं पड़ा
ठहरी हवा में तुम्हारा अक्स ढूंढता हूँ
देख मेरी तन्हाई तुम भी उदास होती होगी अक्सर सोचता हूँ

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आईने में चिपकी अब भी तुम्हारे माथे की बिंदिया
दराजों में वैसे ही रखे सारे श्रृंगार ,चूड़ियाँ
सुबह से शाम इर्द गिर्द डोलती थी
आज आँगन में परछाइयों के पीछे दौड़ता हूँ
… कमरे के बियाबान वीराने आंखों के
कटोरे में ले आंसुओं से बारहा घोलता हूँ……
…देख तन्हा मुझे तुम भी उदास होती होगी अक्सर सोचता हूँ..
..हर फासला मेरी खुली बांहों में सिमट जाता था
पल भर में ही रूठा लम्हा मुस्कुराता था
मेरी खामोशियाँ तुम्हारे सीने में चुभती थी
सर्द चुप्पियाँ ले यादों की तपिश में पिघलता हूँ
खुले आसमाँ के नीचे बैठा अकेला
दूर तक चमकते तारों में तुमको ढूँढता हूँ……..
देख मेरी तन्हाई उदास होती होगी तुम भी अक्सर सोचता हूँ

 

 

 
 
 
 
 
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इस भीड़ में निपट अकेला हूँ तुम बिन मगर
बीते लम्हें संग डगर डगर और शहर शहर
आँचल का छोर आ जाए हाथ फिर से
खुद से भागता दर दर डोलता हूं
जमी के चप्पे चप्पे पे पसरा रंगीन मेला
तुम बिन मगर मरघट वीरान देखता हूँ
देख मेरी तन्हाई उदास होती होगी अक्सर सोचता हूँ

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सूझे न राह उस स्वप्निल जीवन में वापसी की
गोरे मुखड़े को अंजुरी में भरने की
वो स्नेहिल सुबहें किस कीमत पे लौटे
गुनगुनी खिलखिलाहट में खिली हर शाम की
आखरी साँस जो कातर ली थी तुमने
उस पल कहाँ था सर ठोकता हूँ
देख मेरी तन्हाई उदास होती होगी तुम अक्सर सोचता हूँ

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मैं गर तुमको यू जाता देखता
पकड़ कलाई हर हाल रोकता
तुम्हारी रुखसत महज़ खबर दुनिया की खातिर
थकी साँसों में मैं मुर्दा जिस्म ढोता हूँ
पल भर मेरा ख्याल आया तो होगा इतना पूछने
रात काले आसमाँ में देर तक ढूंढता हूँ
देख मेरी तन्हाई उदास होती होगी अक्सर सोचता हूँ

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तुम्हारे जाने से बेअसर जग वैसा ही चलता है
ये देख मेरा मन खामोश जलता है
शूल से सन्नाटों से हो बैचेन फिरता
वो कौन सी जगह जाकर अब तुम्हे पुकारू
आवाज़ का दायरा जहाँ से रूह तक पहुँचता है
एक बुरे ख्वाब से नींद टूटेगी सोच खुद को नोचता हूँ
देख मेरी तन्हाई उदास होती होगी तुम अक्सर सोचता हूँ

 

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